भूविस्थापितों की बड़ी जीत, हाई कोर्ट ने कहा- रोजगार और पुनर्वास से वंचित करना संविधान का उल्लंघन

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January 30, 2026


CG News: भूविस्थापितों को राहत देते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित भूमि स्वामियों को पुनर्वास …और पढ़ें

Publish Date: Thu, 29 Jan 2026 10:01:38 PM (IST)Updated Date: Thu, 29 Jan 2026 10:01:38 PM (IST)

भूविस्थापितों की बड़ी जीत, हाई कोर्ट ने कहा- रोजगार और पुनर्वास से वंचित करना संविधान का उल्लंघन
भूविस्थापितों की बड़ी जीत (फाइल फोटो)

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। भूविस्थापितों को राहत देते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित भूमि स्वामियों को पुनर्वास व रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को भूमि अधिग्रहण की तिथि पर लागू राज्य पुनर्वास नीति का पालन करने के निर्देश एसईसीएल को दिए हैं।

हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित व्यक्तियों को पुनर्वास और रोजगार का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है। इस अधिकार से मनमाने ढंग से वंचित किया जाना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रविंद्र कुमार वर्मा ने कहा कि भूविस्थापितों को पुनर्वास नीति के तहत रोजगार दिया जाना महत्वपूर्ण अधिकार है। भूमि अधिग्रहण की तिथि से यह नीति लागू हो जाती है।

इस नीति की भूमि अधिग्रहण करने वाली कंपनी या संस्था अनदेखी नहीं कर सकती। एसईसीएल के भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास को लेकर दायर याचिका पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि पुनर्वास और रोजगार का अधिकार अनुच्छेद 21 का तार्किक परिणाम है और रोजगार से इन्कार करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के साथ-साथ अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन करता है।

यह है मामला

कुसमुंडा क्षेत्र के अभयराम व अन्य याचिकाकर्ताओं की कृषि भूमि वर्ष 2009 में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड द्वारा अधिग्रहित की गई थी। भूमि अधिग्रहण के समय अफसरों ने भूविस्थापितों को आश्वासन दिया था कि प्रभावित परिवारों को पुनर्वास नीति के अंतर्गत रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। इसके बावजूद जब याचिकाकर्ताओं ने राज्य पुनर्वास नीति के तहत रोजगार के लिए आवेदन किया तो एसईसीएल द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई।

एसईसीएल की अनदेखी को लेकर भूविस्थापितों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने 20 दिसंबर 2019 के आदेश में एसईसीएल को निर्देश दिया था कि वह याचिकाकर्ताओं के दावों पर लागू नीति के अनुसार विचार करे। हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी वर्ष 2020 में एसईसीएल ने यह कहते हुए याचिकाकर्ताओं के दावे को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ताओं के पास दो एकड़ से कम भूमि थी जो एसईसीएल की आंतरिक नीति के अनुरूप नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि एसईसीएल की यह शर्त राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के विपरीत है और सरकारी नीति पर एसईसीएल के दिशा-निर्देश हावी नहीं हो सकते। याचिकाकर्ताओं भूविस्थापितों ने कहा कि भूमि अधिग्रहण के साथ ही रोजगार व पुनर्वास का उनका अधिकार सामने है।

एसईसीएल ने दी दलीलें

एसईसीएल की ओर से पैरवी करते अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता भूमि अधिग्रहण के समय नाबालिग था। भूमि उसके पूर्वजों के नाम पर थी और परिवार के एक अन्य सदस्य को पहले ही रोजगार दिया जा चुका है। यह भी आरोप लगाया गया कि शेष भूमि को कृत्रिम रूप से टुकड़ों में बांटकर कई रोजगार प्राप्त करने का प्रयास किया गया। एसईसीएल की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा केवल इस आधार पर रोजगार से इनकार नहीं किया जा सकता कि परिवार के किसी अन्य सदस्य को पहले ही रोजगार दिया गया है। इन दलीलों से याचिकाकर्ता के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।



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