टोपा गांव टोनाटार चक के अंतर्गत आता है, जबकि बीजराडीह सुरकी चक में शामिल है। बहिष्कार की वजह से न केवल अंतिम संस्कार टोपा में नहीं हो सका, बल्कि परिवा …और पढ़ें

HighLights
- टोपा गांव टोनाटार चक के अंतर्गत आता है, जबकि बीजराडीह सुरकी चक में शामिल है।
- बताया जाता है कि बहिष्कार की वजह से न केवल अंतिम संस्कार टोपा में नहीं हो सका।
- बल्कि इस परिवार के लोगों को दशगात्र कार्यक्रम में शामिल होने से भी रोका जा रहा है।
नईदुनिया न्यूज, भाटापारा। मांवली महासभा द्वारा टोनाटार चक को सामाजिक रूप से बहिष्कृत किए जाने का असर अब आम लोगों के जीवन पर गहराता जा रहा है। टोनाटार चक के अंतर्गत आने वाले 18 गांवों के लोगों पर विवाह, छट्टी, दशगात्र जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। बहिष्कार की अवधि में बेटा-बेटी की शादी जैसे महत्वपूर्ण संस्कार भी नहीं किए जा सकते, वहीं रिश्तेदारों का आना-जाना भी बंद कर दिया गया है।
चक और महासभा के पदाधिकारियों के आपसी मतभेद का खामियाजा अब निर्दोष समाज को भुगतना पड़ रहा है। सामाजिक तनाव और अनिश्चितता के चलते मंडावी गौंटिया बेड़ा सम्मेलन को भी अपरिहार्य कारणों से स्थगित कर दिया गया है।
इसी क्रम में मंगलवार को सामाजिक बहिष्कार से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और पीड़ादायक मामला सामने आया। बीजराडीह निवासी रिखी राम ध्रुव की पत्नी का निधन हो गया। रिखी राम का मूल निवास टोपा गांव है, जहां उनका पूरा परिवार रहता है। उन्होंने अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार अपने निज निवास टोपा गांव में करने की इच्छा जताई, लेकिन सामाजिक बहिष्कार के कारण इसकी अनुमति नहीं मिल सकी।
टोपा गांव टोनाटार चक के अंतर्गत आता है, जबकि बीजराडीह सुरकी चक में शामिल है। बहिष्कार की वजह से न केवल अंतिम संस्कार टोपा में नहीं हो सका, बल्कि परिवार के लोगों को दशगात्र कार्यक्रम में शामिल होने से भी रोका जा रहा है।
एक ही परिवार के सदस्यों को सामाजिक संस्कारों से वंचित किए जाने से समाज में गहरा आक्रोश और पीड़ा व्याप्त है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समाज को जोड़ने के उद्देश्य से बनी संस्थाएं आज समाज को तोड़ने का काम कर रही हैं।
पदाधिकारियों के आपसी मतभेद में आम और निर्दोष परिवारों को मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। ग्रामीणों ने महासभा से इस अमानवीय निर्णय पर पुनर्विचार करने और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देने की मांग की है।
उनका कहना है कि अंतिम संस्कार और दशगात्र जैसे संस्कारों पर रोक किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती। यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो समाज में और अधिक तनाव, असंतोष और विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।