Probation period के बाद नौकरी के स्थायीकरण और प्रमोशन को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि परिवीक्षा अवधि पूरी होने पर स्थायीकरण और पदोन्नति का दावा नहीं किया जा सकता, इसके लिए कार्य और आचरण रिपोर्ट भी जरूरी है।
Publish Date: Sun, 26 Oct 2025 01:23:55 PM (IST)
Updated Date: Sun, 26 Oct 2025 01:25:59 PM (IST)

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: हाई कोर्ट ने एक सर्विस संबंधी मामले में महत्वपूर्व आदेश देते हुए कहा है कि सिर्फ परिवीक्षा अवधि (Probation period) पूरी होने पर स्थायीकरण और पदोन्नति का दावा अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता। प्रतिकूल कार्य एवं आचरण रिपोर्ट के आधार पर प्रमोशन दिया जाना, या नहीं देना भेदभाव नहीं माना जाएगा।
प्रकरण के अनुसार हाई कोर्ट ने अनुवादक के पद को भरने के लिए विज्ञापन प्रकाशित किया था। अपीलकर्ता शैलेन्द्र सोनी और अन्य उम्मीदवारों ने पद के लिए आवेदन किया। परीक्षा के बाद अपीलकर्ता और अन्य प्रतिवादी को 29 फरवरी 2012 को अनुवादक के पद पर नियुक्त किया गया। प्रतिवादी अपीलकर्ता से कनिष्ठ था। दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि पूरी होने के बाद शैलेन्द्र के साथ के अन्य परिवीक्षा कर्मी को सात मार्च 2014 से पद पर स्थायी कर दिया गया। 27 जनवरी 2015 को उसको सहायक ग्रेड-1 के पद पर पदोन्नत किया गया। हालांकि अपीलकर्ता की सर्विस की उस समय पुष्टि नहीं की गई।
देर से स्थायी होने के कारण प्रमोशन से वंचित
शैलेन्द्र का अनुवादक के पद पर स्थायीकरण देर से हुआ। इस कारण उसके सहकर्मी को दी गई पदोन्नति के लिए वह अयोग्य हो गया। व्यथित होकर उसने 29 अप्रैल 2015 को एक अभ्यावेदन प्रस्तुत किया, जिसमें प्रतिवादी से अपनी वरिष्ठता बनाए रखने के लिए पूर्वव्यापी प्रभाव से स्थायीकरण और पदोन्नति का अनुरोध किया।अभ्यावेदन पर विचार नहीं किया गया। इस पर शैलेंद्र ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। सिंगल बेंच ने 16 जुलाई 2025 को याचिका खारिज कर दी। इससे व्यथित होकर अपीलकर्ता कर्मचारी ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की।
यह भी पढ़ें- छत्तीसगढ़ में जुआ खेलते 6 पटवारी गिरफ्तार, प्रदेश संघ का कार्यकारी अध्यक्ष भी शामिल; 20 लाख का सामान जब्त
कार्य और आचरण रिपोर्ट अलग-अलग, इसलिए भेदभाव नहीं
डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद सिंगल बेंच के निष्कर्ष को उचित माना, जिसमें कहा गया था कि कार्य और आचरण रिपोर्ट और एसीआर अलग-अलग हैं। हाई कोर्ट प्रशासन ने तर्क दिया कि मार्च 2014 में अपीलकर्ता की दो साल की परिवीक्षा अवधि पूरी होने पर उसके कार्य और आचरण पर रिपोर्ट अच्छी और औसत नहीं पाई गई।