23 साल बाद कलर्क के माथे से मिटा ‘रिश्वत का कलंक’, Chhattisgarh HC ने कहा- नोट मिलने से दोष साबित नहीं होता

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October 11, 2025


छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रिश्वत लेने के एक मामले में क्लर्क को 23 साल बाद आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी के पास से नोट मिलने से रिश्वत लेना सिद्ध नहीं होता है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि ट्रैप करने वाली टीम के सदस्यों के बयान ही विरोधाभाषी रहे।

Publish Date: Sat, 11 Oct 2025 04:56:02 PM (IST)

Updated Date: Sat, 11 Oct 2025 04:56:31 PM (IST)

23 साल बाद कलर्क के माथे से मिटा 'रिश्वत का कलंक', Chhattisgarh HC ने कहा- नोट मिलने से दोष साबित नहीं होता
रिश्वत के आरोपी कलर्क को हाई कोर्ट ने बरी किया

HighLights

  1. नोट मिलने से रिश्वत साबित नहीं, मांग व स्वीकारोक्ति के साक्ष्य जरूरी: हाई कोर्ट
  2. हाई कोर्ट ने 23 साल बाद रिश्वत के मामले में क्लर्क बाबूराम पटेल बरी कर दिया
  3. कोर्ट ने पाया कि ट्रैप करने वाली टीम के सदस्यों के बयान ही विरोधाभाषी रहे

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: हाई कोर्ट ने बिल्हा तहसील कार्यालय के तत्कालीन क्लर्क बाबूराम पटेल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपित ने रिश्वत की मांग की थी या उसे अवैध लाभ के रूप में स्वीकार किया था।

यह था मामला

लोकायुक्त कार्यालय, बिलासपुर में 20 फरवरी 2002 को शिकायतकर्ता मथुरा प्रसाद यादव ने शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपित बाबूराम पटेल ने उसके पिता की जमीन का खाता अलग करने के नाम पर 5,000 रिश्वत की मांग की थी, जो बाद में 2,000 में तय हुई। शिकायत के आधार पर लोकायुक्त पुलिस ने ट्रैप की कार्रवाई की।

शिकायतकर्ता को 15 नोट 100 के दिए गए, जिन पर फिनाल्फ्थेलीन पाउडर लगाया गया था। आरोप था कि आरोपित ने 1,500 रिश्वत ली, जिसे मौके पर पकड़ लिया गया। लोकायुक्त की टीम ने आरोपित के कपड़े और हाथ धोने पर घोल के गुलाबी होने की बात कही थी।

जांच के बाद उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, बिलासपुर ने 30 अक्टूबर 2004 को उसे एक-एक वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

आरोपित ने की हाई कोर्ट में अपील

बाबूराम पटेल ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता विवेक शर्मा ने तर्क दिया कि आरोपित के खिलाफ झूठा प्रकरण रचा गया है। शिकायतकर्ता की पत्नी पूर्व सरपंच थीं और उनके खिलाफ एक जांच में आरोपित ने भाग लिया था, जिससे निजी द्वेष के चलते झूठा फंसाया गया।

कोर्ट ने दिया यह आदेश

कोर्ट ने कहा कि, अभियोजन अपना मामला संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन नहीं किया। अतः दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2004 का निर्णय रद करते हुए बाबूराम पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।



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