छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एचआईवी पॉजिटिव महिला की पहचान उजागर करने के माले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार और अस्पताल प्रशासन को फटकार लगाई है। कोर्ट ने इस मामले को अमानवीय के साथ ही नैतिकता और निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन बताया है। कोर्ट ने सरकार के मुख्य सचिव को जवाब तलब किया है।
Publish Date: Sat, 11 Oct 2025 01:43:58 PM (IST)
Updated Date: Sat, 11 Oct 2025 01:44:24 PM (IST)

HighLights
- अस्पताल ने की एचआइवी मरीज की पहचान किया उजागर
- हाई कोर्ट ने कहा- यह अमानवीय और असंवेदनशील कृत्य
- हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव से व्यक्तिगत शपथपत्र तलब किया
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रायपुर के डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय में एचआईवी पॉजिटिव महिला मरीज की पहचान सार्वजनिक करने की घटना पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा (मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने शुक्रवार को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार के मुख्य सचिव से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगा है। अदालत ने कहा कि यह कृत्य न केवल अमानवीय है बल्कि नैतिकता और निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन है।
क्या है मामला
हाई कोर्ट ने इस मामले पर तत्काल सुनवाई तब की जब 10 अक्टूबर को प्रकाशित खबर में बताया गया कि रायपुर के डा. भीमराव आंबेडकर अस्पताल में नवजात शिशु के पास एक पोस्टर लगाया गया, जिसमें यह लिखा था कि बच्चे की मां एचआईवी पाजिटिव है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह पोस्टर गाइनो वार्ड में भर्ती मां और नर्सरी वार्ड में रखे नवजात बच्चे के बीच लगाया गया था। जब बच्चे का पिता अपने शिशु को देखने पहुंचा तो उसने यह पोस्टर देखा और भावुक होकर रो पड़ा।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी
अदालत ने कहा कि यह अत्यंत अमानवीय, असंवेदनशील और निंदनीय आचरण है, जिसने न केवल मां और बच्चे की पहचान उजागर कर दी बल्कि उन्हें सामाजिक कलंक और भविष्य में भेदभाव का शिकार भी बना सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह कार्य सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, राज्य के इतने प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह रोगियों के साथ अत्यधिक संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करे। एचआईवी/एड्स जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील मामलों में पहचान उजागर करना गंभीर चूक है।
सरकार से मांगा विस्तृत जवाब
अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे 15 अक्टूबर 2025 तक व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करें। इसमें यह स्पष्ट किया जाए कि, सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कालेजों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों की गोपनीयता सुनिश्चित करने की वर्तमान व्यवस्था क्या है। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कर्मचारियों को संवेदनशील बनाने के क्या कदम उठाए गए हैं। डॉक्टरों, नर्सों और पैरा-मेडिकल स्टाफ को कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करने के लिए भविष्य में क्या उपाय प्रस्तावित हैं।
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अदालत ने कहा- दोबारा ऐसी गलती न दोहराई जाए
हाई कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह की घटनाएं न केवल कानूनी दायरे में अपराध हैं बल्कि मानव गरिमा पर सीधा प्रहार भी हैं। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रति तुरंत मुख्य सचिव को भेजी जाए ताकि समय पर कार्रवाई और जवाब सुनिश्चित हो सके। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2025 को होगी। उस दिन राज्य सरकार को अपनी विस्तृत रिपोर्ट और सुधारात्मक कदमों की जानकारी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।