Chhattisgarh Blind Teacher Story; Sandhya Pandey | Shikshak Diwas | आंखों की रोशनी खोने के बाद भी नहीं टूटा हौसला: 7 महीने कोमा में थी,टीचर बनने का ठाना; 20 सालों से बच्चों को पढ़ा रहीं – Chhattisgarh News

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September 5, 2025


संध्या पांडे सरईभद्दर के शासकीय माध्यमिक विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर पदस्थ हैं।

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ की रहने वाली नेत्रहीन दिव्यांग शिक्षिका संध्या पांडे ने यह साबित कर दिखाया है कि हौसले और जुनून के सामने कोई भी कमी मायने नहीं रखती। आंखों से दुनिया को देख न पाने के बावजूद संध्या आज सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाकर उन्हें उज्ज्व

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सरईभद्दर के शासकीय माध्यमिक विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर पदस्थ संध्या की कहानी संघर्ष, साहस और समर्पण की मिसाल पेश करती है। शिक्षक दिवस के मौके पर पढ़िए संध्या की प्रेरणादायक कहानी…

संध्या पांडे 5 बहनों में सबसे बड़ी हैं। संध्या संस्कृत की शिक्षिका है। उनकी मां हर दिन उनके साथ स्कूल जाती हैं। संध्या कक्षा के बच्चों से पढ़ने कहती है, जिसे सभी बच्चे ध्यान से सुनते हैं। कहीं कोई समस्या हो तो संध्या उसे दूर करती है। बात जब ब्लैक-बोर्ड पर लिखकर समझाने की हो, तब संध्या की मां मदद करती हैं।

स्कूल में बच्चों को संस्कृत विषय पढ़ाती हुईं संध्या पांडे।

स्कूल में बच्चों को संस्कृत विषय पढ़ाती हुईं संध्या पांडे।

सिर में तेज दर्द हुआ, बुखार आया

संध्या का जन्म छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में हुआ था। उनके पिता एल.पी. पांडे शासकीय नटवर हाई स्कूल में गणित के शिक्षक थे और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। साल 1999-2000 में संध्या गणित विषय में एमएससी की पढ़ाई कर रही थीं। फाइनल ईयर में अचानक उनके सिर में तेज दर्द हुआ और बुखार आ गया।

परिजन उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए ले गए, लेकिन उस दौर में अस्पतालों में सिटी स्कैन और एमआरआई जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इसके चलते डॉक्टरों ने उन्हें आगे की जांच के लिए रायपुर के एक अस्पताल में रेफर कर दिया।

अचानक चली गई आंखों की रोशनी

इस दौरान अचानक उसकी आंखों की रोशनी और आवाज चली गई। इसके बाद वह साढ़े 7 माह कोमा में रही। परिजनों ने इलाज के लिए कई अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन संध्या की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। संध्या को वापस रायगढ़ के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

ऑफिस काम करने के लिए उनकी मदद स्कूल की अन्य शिक्षिका करते हैं।

ऑफिस काम करने के लिए उनकी मदद स्कूल की अन्य शिक्षिका करते हैं।

आवाज लौटी, पर आंखों की रोशनी नहीं

इसी बीच संध्या की आवाज तो लौट आई, लेकिन आंखों की रोशनी नहीं लौटी। संध्या घर में गुमसुम, निराश रहने लगी। माता-पिता उसे देखकर मन ही मन दुखी होते, लेकिन कुछ कर नहीं पाते।

ऐसे में माता-पिता ने संध्या को कुछ करने प्रोत्साहित किया, ताकि उसका मन उदास न रहे।

दूसरे को शिक्षा देने की सोच

तब संध्या ने सोचा कि क्यों न जो शिक्षा उसे मिली है, उसी को दूसरे को बांटा जाए। ताकि किसी और का भविष्य बने। इसी दौरान 2005 में उसे जानकारी मिली कि शिक्षकों की सीधी भर्ती की वैकेंसी निकली है।

उसमें सौ फीसदी नेत्रहीन शिक्षक का भी पद है। उन्होंने इंटरव्यू दिया और शिक्षिका के पद पर सिलेक्ट हुईं।

डुमरपाली के स्कूल में पहली पोस्टिंग

संध्या की पहली पोस्टिंग शहर से करीब 10 किमी दूर स्थित कोड़ातराई के डुमरपाली के मिडिल स्कूल में हुई। तब उन्हें स्कूल तक पहुंचने में परेशानी होती थी। हालांकि, मां शारदा पांडे साथ जाती थी, लेकिन परेशानियों का सामना करना पड़ा रहा था।

उन्होंने रायगढ़ ट्रांसफर का प्रयास किया और 2008 में उनका ट्रांसफर शहर के सरईभद्दर शासकीय माध्यमिक स्कूल में हो गया।

संध्या के बताने पर उनकी मां ब्लैक-बोर्ड पर लिखकर उसकी मदद करती हुई।

संध्या के बताने पर उनकी मां ब्लैक-बोर्ड पर लिखकर उसकी मदद करती हुई।

शिक्षिका से स्कूल की हेडमास्टर बनीं

तब से लेकर आज तक संध्या पांडे यहीं बच्चों को पढ़ा रही है। वर्तमान में वे छठवीं कक्षा के बच्चों को संस्कृत की पढ़ाई कराती हैं। 2023 में उन्हें प्रमोशन मिला और इसी स्कूल में हेडमास्टर के पद पर कार्य कर रही हैं। स्कूल स्टाफ ऑफिस के कार्यों को पूरा करने में उनकी मदद करते हैं।

ब्रेल लिपी का इस्तेमाल नहीं

हेडमास्टर संध्या पांडे ने बताया कि वे ब्रेल लिपी या किसी से अन्य माध्यम से नहीं पढ़ाती है। बल्कि जो उन्होंने पढ़ा था, उसी हिसाब से बच्चों को शिक्षा देती हैं।

संध्या की मां शारदा पांडे ने बताया कि बच्चे पहले पढ़ते हैं और उसके बाद संध्या उसे बच्चों को समझाती हैं। जहां बच्चों को समझ नहीं आता, वे बार-बार पूछते हैं।

तब वह फिर से समझाती है। शारदा पांडे ने बताया कि किसी प्रकार का लिखना हो तो उसके लिए वह लिखकर बेटी की मदद करती हैं।

लंबे समय से साथ काम कर रहे

स्कूल की शिक्षिका गौरी पटेल ने बताया कि संध्या को पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं आती है। वे उनके साथ लंबे समय से काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि संध्या प्रमोशन में अभी प्रधान पाठक के पद पर पदस्थ हैं और उनके दिशा निर्देश पर स्कूल में सभी कार्य करते हैं।

हमें महसूस ही नहीं होता कि इनमें कोई समस्या है। विभाग से कुछ भी जानकारी आती है तो हम उसे पढ़ कर बताते हैं। फिर वे जैसा बताती हैं, वैसा ही करते हैं। कभी भी कोई दिक्कत नहीं आती है।



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