अष्टकमल पर विराजित है महालक्ष्मी देवी।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पहला प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर है, जिसे लखनी देवी मंदिर कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि द्वापरयुग में पांडवों ने यहां अश्वमेघ यज्ञ किया था, और उसी समय मां लक्ष्मी स्वयं प्रकट हुई थीं। इसके बाद पांडवों ने यहां महालक्ष्मी की
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यह मंदिर श्रीयंत्र के आकार में बना है और मां लक्ष्मी अष्ट कमल (आठ पंखुड़ियों वाले कमल) पर विराजमान हैं। पुरातात्विक मान्यता है कि यह मंदिर करीब 800 साल से भी ज्यादा पुराना है। दीपावली के मौके पर यहां विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान किए जाते हैं, ताकि लोग सुख, समृद्धि और धन-वैभव की कामना कर सकें।
बिलासपुर से 25 किलोमीटर दूर प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी रतनपुर की पहचान आदि शक्ति महामाया देवी के नाम पर है, लेकिन यहां कई पौराणिक मान्यताएं भी जुड़ी हुई है। यहां ऐतिहासिक और पुरातात्विक कलाकृतियों के साथ ही पौराणिक कथाओं का उल्लेख मिलता है।
रतनपुर में बने प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों में त्रेता युग के भगवान श्रीराम से जुड़ी बातें और द्वापर युग में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान किचक वध की कहानी प्रचलित है।

दिवाली पर्व पर आदि शक्ति महामाया देवी के दरबार में भी पहुंचे श्रद्धालु।
पांडवों के अश्वमेघ यज्ञ में स्वयं प्रकट हुईं मां महालक्ष्मी मंदिर के पुजारी रेवाराम उपाध्याय बताते हैं कि इस महालक्ष्मी मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक मान्यता है। कहा जाता है कि द्वापर युग के अंत में, जब पांडव अज्ञातवास में थे, तब उन्होंने किचक का वध किया था। किचक ब्राह्मण जाति का था और पांडव क्षत्रिय थे, इसलिए उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लग गया। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडवों को रतनपुर में अश्वमेघ यज्ञ करने की सलाह दी गई।
ब्रह्म हत्या के पाप से उद्धार और अश्वमेघ यज्ञ के लिए पांडवों के पास धन-धान्य नहीं था। यज्ञ करने के लिए जरूरी साधन भी नहीं थे। इसलिए पांडवों ने महालक्ष्मी देवी की विशेष पूजा की। उनकी भक्ति से मां लक्ष्मी खुद प्रकट हुईं और पांडवों को धन-धान्य का आशीर्वाद दिया। इसके बाद पांडवों ने सफलतापूर्वक अश्वमेघ यज्ञ किया और पाप से मुक्ति पाई।
यज्ञ के बाद पांडवों ने यहां महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की। तभी से लोग यहां आकर धन, सुख और समृद्धि की कामना से मां लक्ष्मी की पूजा करने लगे। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने पर धन और खुशहाली जरूर मिलती है।
कल्चुरी राजा ने 800 साल पहले स्थापित की थी प्रतिमा रतनपुर में जो लखनी देवी मंदिर है, वह असल में मां लक्ष्मी का ही मंदिर है। ‘लखनी’ नाम लक्ष्मी शब्द का आसान और आम बोलचाल में बोला जाने वाला रूप है, जो लोगों के बीच प्रचलित हो गया। यह मंदिर जिस पहाड़ी पर बना है, उसे इकबीरा पर्वत, वाराह पर्वत, श्री पर्वत और लक्ष्मीधाम पर्वत जैसे कई नामों से जाना जाता है।
पुरातत्व विभाग के अनुसार, यह मंदिर करीब 800 साल पुराना है। इसे कल्चुरी राजा रत्नदेव तृतीय के समय में उनके प्रधानमंत्री गंगाधर ने वर्ष 1179 में बनवाया था।

रतनपुर की पहाड़ी पर विराजित है लक्ष्मी माता की प्रतिमा।
श्रीयंत्र से बने मंदिर में अष्टकमल पर विराजित हैं माता
प्राचीन मान्यता के अनुसार, साल 1178 में, जब कल्चुरी राजा रत्नदेव तृतीय ने राज्य संभाला, तब राज्य में अकाल और महामारी फैली हुई थी। राजकोष भी खाली हो गया था, जिससे लोग बहुत परेशान थे।
ऐसे समय में राजा के विद्वान मंत्री पंडित गंगाधर ने लोगों की भलाई के लिए मां लक्ष्मी का मंदिर बनवाने की सलाह दी। जब मंदिर बनकर तैयार हुआ और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना शुरू हुई, तो धीरे-धीरे अकाल और बीमारी खत्म हो गई। राज्य में सुख, शांति और समृद्धि लौट आई।
इस मंदिर की बनावट पुष्पक विमान की तरह है, जैसा कि शास्त्रों में बताया गया है। मंदिर के अंदर श्री यंत्र भी स्थापित है, जो मां लक्ष्मी की शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
धन-धान्य और वैभव की कामना के लिए होती है विशेष पूजा-आराधना वैसे तो इस मंदिर में नवरात्र पर्व पर विशेष पूजा-आराधना की जाती है। इसके साथ ही लोग सुख-शांति और धन-धान्य की कामना को लेकर यहां ज्वारा कलश भी स्थापित किया जाता है। श्रद्धालु इस जगह को अन्नपूर्णा माता और माई की बगिया के रूप में मानते हैं।
यह पहला ऐसा मंदिर है जहां ज्वारा कलश के नाम पर रसीद काटी जाती है। वहीं, दीपावली के समय भी यहां धन-धान्य, वैभव और सुख-समृद्धि के लिए खास पूजा और अनुष्ठान किया जाता है।
जानिए दिवाली पर्व पर महालक्ष्मी की पूजा का महत्व 18 अक्टूबर को धनतेरस के साथ ही दीपोत्सव पर्व शुरू हो गया है। पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व के तीसरे दिन यानी कार्तिक अमावस्या पर महालक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। महालक्ष्मी पूजा को सुख, समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है। इस बार महालक्ष्मी पूजा सोमवार 20 अक्टूबर को मनाई जा रही है।
शास्त्रों के अनुसार, इस दिन देवताओं और दानवों ने समुद्र मंथन किया था, जिससे मां लक्ष्मी प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को अपना साथी बनाया था। तभी से इस दिन महालक्ष्मी की पूजा की जाती है और लोग धन, वैभव और खुशहाली की कामना करते हैं।

धन-धान्य और सुख समृद्धि की कामना लेकर पहुंचते हैं भक्त।
अमावस्या पर काली पूजन आज शहर में कार्तिक अमावस्या पर दिवाली पर्व मनाने के साथ मध्य रात्रि मां काली की विधिविधान से पूजा की परंपरा है। बिलासपुर में 100 साल से यह परंपरा चल रही है। शुरुआत में दुर्गा पंडालों में मां काली की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना होती थी। बाद में रेलवे परिक्षेत्र के कालीबाड़ी में बंगाल की तर्ज पर पूजा होने लगी।
अब मंगला, कुदुदंड, सरकंडा के मुक्तिधाम, विनोबा नगर, हेमू नगर और कई जगहों पर भी काली पूजा बड़े धूमधाम से होती है।
काली पूजा में व्रतियों द्वारा पुष्पांजलि देने की परंपरा है। आधी रात पूजा-अर्चना कर व्रती मंत्रोच्चार और शंख की पवित्र ध्वनि के साथ 108 कमल के फूलों से मां को पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। यह पूजा पूरी रात चलती रहती है। साथ ही मां के दरबार को 108 दीपों से भी सजाया और रोशन किया जाता है।