नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। सीएसपीडीसीएल रायपुर निर्माण संभाग में निर्माण कार्यों की निविदाओं में पहले काम पूरा कराया गया, मापन के बाद बिल बनाया और फिर छह माह बाद उन्हीं निविदाओं को निरस्त कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
वित्तीय अनियमितता का संकेत
अधीक्षण अभियंता एम विश्वकर्मा और कार्यपालन अभियंता शिव गुप्ता की भूमिका संदेह में है। दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी निविदा निरस्तीकरण को विशेषज्ञ वित्तीय अनियमितता का संकेत मान रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक जिन कार्यों पर विवाद है वे संबंधित निविदाओं के तहत पूर्ण हो चुके थे। कार्य स्थल का हस्तांतरण, सर्वे, परमिट, ट्रांसफार्मर इश्यू, लाइन चार्ज की अनुमति जैसे सभी तकनीकी चरण पूरे किए गए। इसके बाद विभागीय मापन हुआ और बिल भी तैयार किए गए।
चौंकाने वाली बात यह है कि बिलों की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद उन्हें तत्काल भुगतान के बजाय छह माह तक कार्यपालन अभियंता शिव गुप्ता के कार्यालय में विचाराधीन रखा गया। बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई लिखित आदेश के बजाय मौखिक निर्देशों के आधार पर हुई।
आरोप पत्र और निविदा निरस्तीकरण का समय संदिग्ध
इसी दौरान अधीक्षण अभियंता विश्वकर्मा को आरोप पत्र जारी हुआ। इसके बाद भी वे उसी पद पर बने रहे और संबंधित मामलों पर प्रभाव बनाए रखे। करीब छह महीने बाद अचानक आदेश जारी कर उन्हीं निविदाओं को अलग-अलग कारणों से निरस्त कर दिया गया, जिनके कार्य पूरे हो चुके थे और बिल प्रक्रिया भी हो चुकी थी।
विभागीय जानकारों का कहना है कि यदि कार्य पूर्ण था और मापन के आधार पर बिल तैयार हुए थे, तो निविदा निरस्तीकरण नियमों के विपरीत है।
यह है निविदा प्रक्रिया
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी वैध कार्य के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य होती है, निविदा खुलने के बाद विधिवत कार्यादेश, साइट हैंडओवर, कार्यस्थल हस्तांतरण, उप अभियंता द्वारा सर्वे, कार्य के लिए परमिट जारी, ट्रांसफार्मर इश्यू (यदि आवश्यक हो), निरीक्षण के बाद लाइन चार्ज की अनुमति, इन चरणों के बाद ही मापन के आधार पर बिल तैयार होते हैं।
बिलों पर बाबू, उप अभियंता और कार्यपालन अभियंता के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। इस मामले में तो अधीक्षण अभियंता के काउंटर सिग्नेचर भी लिए गए, जो सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माने जाते।
जिन्हें आरोप पत्र मिला, वही निर्णय प्रक्रिया में
सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन अधिकारी को आरोप पत्र मिला, वे उसी पद पर बने रहकर निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते रहे।
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