EWS आरक्षण पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार मौन… आखिर छत्तीसगढ़ में क्यों लागू नहीं हो पाया 10% कोटा? जानें पूरी इनसाइड स्टोरी

Author name

February 1, 2026


संदीप तिवारी, नईदुनिया, रायपुर। छत्तीसगढ़ में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के युवाओं के लिए आरक्षण अब तक हकीकत नहीं बन सका है। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2019 में लागू किए गए ईडब्ल्यूएस आरक्षण कानून को सात साल बीत जाने के बावजूद राज्य में लागू नहीं किया जा सका। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के सियासी फैसलों और कानूनी पेच के कारण यह मामला लटकता चला गया, जो अब भाजपा की मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार में भी अधर में है। इसका सीधा असर यह है कि हजारों पात्र युवा शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लाभ से वंचित हैं।

एक ओर केंद्र सरकार यूजीसी बिल लाकर नया कानून बनाने की प्रक्रिया में है, जो विवादों में घिर गया है, वहीं दूसरी ओर राज्य और केंद्र सरकारें ईडब्ल्यूएस आरक्षण कानून के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर नजर नहीं आ रही हैं। कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए आरोप-प्रत्यारोप कर रही हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की राजनीति के कारण प्रदेश के एक वर्ग का संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुआ है।

अदालत की सख्ती, सरकार की चुप्पी

करीब आठ महीने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस ए.के. प्रसाद ने राज्य सरकार से सवाल किया था कि अब तक ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू क्यों नहीं किया गया। पुष्पराज सिंह व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए। याचिका में कहा गया है कि जब मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू है, तो छत्तीसगढ़ में युवाओं को इससे वंचित क्यों रखा गया है।

76 प्रतिशत आरक्षण बना सबसे बड़ा रोड़ा

विशेषज्ञों के अनुसार, ईडब्ल्यूएस आरक्षण की राह में सबसे बड़ी बाधा दिसंबर 2022 में तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार का वह फैसला बना, जिसमें कुल आरक्षण सीमा 76 प्रतिशत कर दी गई थी। इस प्रस्ताव में एसटी को 32 प्रतिशत, एससी को 13 प्रतिशत, ओबीसी को 27 प्रतिशत और ईडब्ल्यूएस को चार प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। विवाद की वजह केंद्र के 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस प्रावधान को घटाना और कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा से ऊपर ले जाना रहा। राजभवन के विधि विशेषज्ञों ने इसे अव्यावहारिक माना और तत्कालीन राज्यपाल अनुसुइया उइके ने विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिससे मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

आरक्षण की उलझन पुरानी

विधिक विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में आरक्षण का मामला पहले से ही जटिल रहा है। वर्ष 2012 में 58 प्रतिशत आरक्षण को हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद 76 प्रतिशत आरक्षण का राजनीतिक दांव खेला गया, लेकिन इससे जुड़े संशोधित विधेयक अब तक संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल नहीं हो सके। इसी विवाद के साथ ईडब्ल्यूएस आरक्षण को जोड़ दिए जाने के कारण केंद्र का 10 प्रतिशत कानून राज्य में लागू नहीं हो पाया।

अब साय सरकार पर फैसला लेने का दबाव

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब यह स्पष्ट करना साय सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ईडब्ल्यूएस के 10 प्रतिशत केंद्रीय प्रावधान को अलग से लागू करेगी या फिर पुराने विवादित विधेयक के समाधान का इंतजार करेगी।

पक्ष और विपक्ष के तर्क

भाजपा के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने कहा कि आरक्षण की मौजूदा स्थिति के लिए कांग्रेस और भूपेश बघेल सरकार जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि जिस दिन विधेयक पारित हुआ, उसी दिन इसे नौवीं अनुसूची में शामिल कराने की बात कही गई, ताकि न्यायिक समीक्षा न हो सके, जो केवल दिखावे की राजनीति थी।

भाजपा विधिक प्रकोष्ठ के पूर्व पदाधिकारी और अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता ने कहा कि भूपेश सरकार की अदूरदर्शिता और गलत कानूनी रणनीति के कारण यह स्थिति बनी। ईडब्ल्यूएस को जानबूझकर विवादित विधेयक से जोड़ा गया, जिससे इसका लाभ न मिल सके।

कांग्रेस का क्या कहना

वहीं कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने जनसंख्या के आधार पर सभी वर्गों को न्याय देने के लिए विधेयक पारित किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान भाजपा सरकार अपनी ही केंद्र सरकार के कानून को लागू नहीं कर पा रही है और केवल राजनीति कर रही है।



Source link