छत्तीसगढ़ की बालिका अनविका अग्रवाल ने 10 साल की उम्र में एवरेस्ट के बेस कैंप तक पहुंच इतिहास रच दिया है। ऐसा करने वाली यह छत्तीसगढ़ के सबसे कम उम्र की बच्ची बन गई है। उसने यह ट्रेक नेपाल के खतरनाक और दुर्गम रास्तों से होते हुए पूरा किया।
By Roman Tiwari
Publish Date: Sun, 22 Jun 2025 02:48:58 PM (IST)
Updated Date: Sun, 22 Jun 2025 02:48:58 PM (IST)

HighLights
- एवरेस्ट के बेस कैंप पहुंची 10 साल की बच्ची
- 17,600 फीट की ऊंचाई पर पहुंचकर रचा इतिहास
- नेपाल के खतरनाक और दुर्गम रास्तों पर किया ट्रेक
नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर : छत्तीसगढ़ की धरती ने एक बार फिर गौरव का क्षण देखा है। केवल 10 वर्ष की उम्र में रायपुर की अनविका अग्रवाल ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप (Mount Everest base camp) तक पहुंचकर इतिहास रच दिया है। 17,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्गम स्थल तक पहुंचने वाली वह छत्तीसगढ़ की सबसे कम उम्र की बालिका बन गई हैं।
बता दें कि अनविका ने यह कठिन ट्रेक नेपाल के खतरनाक और दुर्गम रास्तों से होते हुए पूरा किया, जिसमें साहस, धैर्य और मानसिक मजबूती की कड़ी परीक्षा होती है। इस ट्रेक को पूरा करने के लिए अनविका ने महीनों तक शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण लिया। बेहद कम उम्र में इतनी ऊंचाई और विषम परिस्थितियों का सामना कर सकना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं
अनविका की इस सफलता के पीछे उनके माता-पिता और प्रशिक्षकों का भी विशेष योगदान रहा। उन्होंने न सिर्फ उसका हौसला बढ़ाया, बल्कि पूरी यात्रा के दौरान उसे हर जरूरी सुविधा और सहयोग भी उपलब्ध कराया। अनविका का यह कारनामा उन तमाम बच्चों और अभिभावकों के लिए प्रेरणा है जो कुछ अलग करने का सपना देखते हैं। एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक सिर्फ एक पर्वतारोहण नहीं, बल्कि एक जीवन अनुभव होता है, जो व्यक्ति को साहस, अनुशासन और आत्मविश्वास से भर देता है। अनविका ने कम उम्र में यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।
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बता दें कि, विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की चढाई करने के लिए पर्वतारोही सबसे पहले बेस कैंप पहुंचते हैं। उसके बाद यहां से माउंट एवरेस्ट के लिए आगे बढ़ते हैं। लेकिन बेस कैंप होने के बावजूद यहां तक पहुंच पाना अपने आप में बड़ी बात है। यहां तक पहुंचने का रास्ता ही कठिनाईयों से भरा रहता है। लोग यह चढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाते हैं। ऐसे में 10 साल की बच्ची का यहां तक पहुंचना भी बहुत साहस और हौसले की प्रतीक हैं।